MPPSC Mains 2020 Paper VI
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण
प्रस्तावना: पर्यावरण संरक्षण का मतलब है प्रकृति के समस्त संसाधनों को सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध रखना। पर्यावरण हमारे जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम पांच तत्वों (जल, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु) से मिलकर बने हैं। पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझने के लिए हमें हमारी प्राचीन संस्कृति की ओर मुड़ना होगा, जिसमें प्रकृति को पूजा, सम्मान, सह-अस्तित्व, सह-सृजन की भावना से देखा गया है।
मुख्य-भाग: प्राचीन काल से ही हमारे ऋषि-मुनि, संत-साधु, कवि-लेखक, चिन्तक-समाजसेवी, धर्म-संस्थापकों ने प्रकृति के प्रति प्रेम, कृतज्ञता, सेवा, सुरक्षा, संरक्षण की महती प्रेरणा दी है।
प्रकृति को पूजा: हमारी संस्कृति में प्रकृति के हर अंग (पेड़-पौधे, पुष्प-पलाश, पहाड़-नदी, सूर्य-चन्द्र) को किसी-न-किसी देवता (सोम, मरुत्, प्रिथिवी, सूर्य) का प्रतीक माना गया है, और उनकी पूजा-प्रार्थना (प्रतिदिन, प्रति-माह, प्रति-संवत्सर) की जाती है। इससे हमें प्रकृति के प्रति आदर, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास की भावना उत्पन्न होती है।
प्रकृति को सम्मान: हमारी संस्कृति में प्रकृति को माता (पृथ्वी, गंगा, गाय), पिता (द्यौ, सूर्य, वृक्ष), भाई-बहन (अग्नि, सरस्वती, सप्त-सिन्धु), मित्र (चन्द्र, मरुत्, पर्वत) के रूप में माना गया है, और उनके साथ संबंधों का पालन (रक्षा-बंधन, भाई-दूज, पितृ-पक्ष) किया जाता है। इससे हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, सह-अस्तित्व, सह-आनंद की भावना उत्पन्न होती है।
प्रकृति को सह-अस्तित्व: हमारी संस्कृति में प्रकृति को हमारा सह-चर (जीवन-साथी) माना गया है, जिसके साथ हमें सुख-दुख, हित-हानि, लाभ-नुकसान में समान भागीदारी (सह-कर्म) करनी होती है। हमें प्रकृति के संसाधनों का समुचित (संतुलित) उपयोग (सह-लेन-देन) करना होता है, और प्रकृति के प्रलोभनों (सुन्दरता) का समुपभोग (सह-रस) करना होता है।
प्रकृति को सह-सृजन: हमारी संस्कृति में प्रकृति को हमारा सह-कलाकार (सह-रचनाकार) माना गया है, जिसके साथ हमें सुन्दर (सुरुचिपूर्ण), सुलभ (सुललित), सुरक्षित (सुरक्षित) और समुपयोगी (सुप्रसन्न) कला-कृतियों (लेख, चित्र, मूर्ति, मंदिर) की रचना (सह-निर्माण) करनी होती है।
निष्कर्ष: प्रकृति के प्रति हमारी संस्कृति की इन भावनाओं को हमें आज भी जीवित, जागृत, जोशीला और जुनूनी रखना होगा, क्योंकि प्रकृति ही हमारा सच्चा मित्र, मार्गदर्शक, पोषक, पालक, संरक्षक है। प्रकृति के संरक्षण के लिए हमें प्रकृति के साथ समन्वय, समरसता, समझौता, समझदारी, समर्पण का भाव रखना होगा।
सुझाव: प्रकृति के संरक्षण के लिए हमें कुछ कार्यक्रम (पर्यावरण-दिवस, पेड़-लगाओ-अभियान, प्रकृति-प्रेमी-संघ) की स्थापना, कुछ कानून (प्रकृति-संरक्षण-अधिनियम, प्रकृति-सुरक्षा-नियम) का पालन, कुछ उपाय (प्रकृति-सह-प्रवास, प्रकृति-सह-मेधा, प्रकृति-सह-सेवा) का अनुसरण करना होगा।


देखिये 2020 मुख्य परीक्षा में पूछे गए निबंध का आदर्श उत्तर